व्यवसाय में युवाशक्ति ने नयी चेतना एवं चमक पैदा की है। वित्त, प्रबन्धन, उत्पादन, आयात-निर्यात आदि व्यवसाय के सभी क्षेत्रों में युवाओं ने अपनी एक खास जगह बनायी है। पहले के दशकों की तुलना में इस दशक के व्यवसाय में क्रियाशील युवाशक्ति में काफी अभिवृद्धि हुई है। पहले कभी जिन व्यावसायिक क्षेत्रों में प्रौढ़ एवं वृद्धजन बागडोर सँभाले हुए थे, अब वहाँ युवा अपने नेतृत्व का कौशल दिखा रहे हैं। विशेषज्ञों की नजर में यह राष्ट्रीय विकास के लिए शुभ संकेत है। उनका यह भी कहना है कि यह सम्भवतः युवाचेतना का ही चमत्कार है कि विश्व व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा में भारत तेजी से बढ़ रहा है। उसने अब तक अनेकों को पीछे धकेला है और अनेकों को पीछे करने की तैयारी में है।

यह सामर्थ्य उसे युवाओं से मिली है। ग्लोबल परिदृश्य में सबसे जवान देश का खिताब हासिल कर चुके अपने देश ने व्यावसायिक पटल पर ऐसी ही इबारत लिखने की तैयारी कर ली है। आमतौर पर हर काम के लिए बड़े-बुजुर्गों पर निर्भर रहने वाले देश ने अब युवाओं पर अपना भरोसा जताया है। यही वजह है कि एक समय जहाँ उच्च पद पाने के लिए अधिक उम्र भी योग्यता की कसौटी मानी जाती थी, वहीं आज के दौर में युवाओं पर व्यावसायिक प्रतिष्ठानों की जिम्मेदारी डाली जा रही है। अंतर्राष्ट्रीय नियोजन फर्म ईमा पार्टनर्स के एक अध्ययन के मुताबिक भारतीय कम्पनियों में नेतृत्व की औसत उम्र सभी उद्योगों में घटी है। इसके चलते ३० से ४० साल की उम्र के बीच वाले लोग कम्पनियों के प्रमुखों का दायित्व सँभाल रहे हैं।

अध्ययन करने वाले व्यवसाय विशारदों का कहना है कि पिछले पाँच साल के दौरान यह औसत आयु नौ साल तक कम हुई है। ईमा के प्रबन्ध निदेशक (भारत) के. सुदर्शन के अनुसार शीर्ष कार्यकारी पदों पर आज युवा लोगों की भरमार है। आईटी, आईटी आधारित सेवाओं, बैकिंग तथा वित्तीय सेवा क्षेत्र में यह रुझान प्रमुखता से देखने को मिल रहा है। अध्ययन में यह भी बताया गया है कि बैकिंग एवं वित्तीय सेवा क्षेत्र में वर्ष २००६ के दौरान मुख्य कार्यकारी अधिकारियों (सी.ई.ओ) की औसत आयु में भारी गिरावट आयी है। जबकि २००१ में ऐसा कुछ भी नहीं था। विशेषज्ञ इसे इक्कीसवीं सदी में देश के उज्ज्वल भविष्य का शुभ संकेत मान रहे हैं। इसी तरह प्रौद्योगिकी और साफ्टवेयर सेवा क्षेत्र में सीइओ की औसत आयु इस साल काफी कम हुई है। इस वर्ष यहाँ भी युवा शक्ति ने अपना प्रभाव प्रतिष्ठित किया है।व्यवसाय विशारद कहते हैं कि औसत आयु में आयी गिरावट और इस तरह के प्रोफेशनलों की बढ़ती माँग के बीच गहरा सम्बन्ध है। इनका कहना है कि आईटी व बी.पी.ओ. वित्तीय सेवा क्षेत्रों में इनकी जबरदस्त माँग है।

अधिक से अधिक युवा लोग यहाँ आ रहे हैं। इनका यह भी मानना है कि कम्पनियों में मुख्य कार्यकारी की औसत आयु में आयी गिरावट से विभिन्न क्षेत्रों में परिपक्वता बढ़ी है। आँकड़ों के आइने में देखें तो इस समय भारत का बेहद निखरा रूप नजर आता है। पिछले वर्ष प्रतिष्ठित पत्रिका ‘फोर्ब्स’ द्वारा जारी अमीरों की सूची में केवल बारह नाम शामिल थे। इस वर्ष उनकी यह संख्या दोगुनी है। इतना ही नहीं, इस साल दुनिया की शीर्ष कम्पनियों की सूची में ३३ भारतीय कम्पनियों ने अपने नाम दर्ज कराकर एक और मील का पत्थर गाड़ा है। पिछले दिनों हमारे सूचकांक ने अमेरिकी सूचकाँक ‘डी जोंस’ की श्रेणी में शामिल होकर इतिहास के पन्नों में सुनहरी इबारत दर्ज की है। कुछ समय पहले तक भारतीय संवेदी सूचकांक जहाँ ३००० से ४००० के आसपास घूमता था, वही अब यह बढ़कर १२००० के ऐतिहासिक आँकड़े को पार कर चुका है।

अपने वित्त मंत्री का इस सम्बन्ध में कहना है कि यह स्वप्न देश के युवाओं के सहयोग से साकार हुआ है। युवा जब से तेजी से व्यावसायिक क्षेत्र में आये हैं, तब से राष्ट्रीय व्यवसाय की प्रतिष्ठा एवं प्रामाणिकता बढ़ी है। कल तक जहाँ इस बात पर देश भर में हाय-तौबा मची थी कि आॢथक उन्नति की दौड़ में भारत चीन से पिछड़ गया है, वहीं आज युवाओं ने हालत बदल दिये हैं। अंतर्राष्ट्रीय आॢथक अनुसंधान संस्थानों की रिपोर्टों में भारतीय अर्थ व्यवस्था व व्यवसाय की शान में कसीदे गढ़े जा रहे हैं। बहुराष्ट्रीय संस्थान प्राइस वाटर हाऊस कूपर्स (पीडब्ल्यूसी) की रिपोर्ट का कहना है कि आगामी सात वर्षों के भीतर भारतीय अर्थव्यवस्था चीन को पीछे छोड़ देगी, जबकि गोल्डमैन सच की ब्रिक्स (ब्राजील, रूस, चीन) रिपोर्ट में कहा गया है कि २०१२ तक भारतीय अर्थव्यवस्था चीन के साथ कदम ताल कर रही होगी। ब्रिक्स रिपोर्ट के मुताबिक २०५० तक भारत दुनिया की अकेली अर्थव्यवस्था होगी, जो अपनी सर्वश्रेष्ठ विकास दर कायम रख पायेगी।

यदि ऊपर की कही बातें किसी को अतिशयोक्तिपूर्ण लगें तो भी वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की रिपोर्ट पर किसी को संदेह की गुंजाइश नहीं करनी चाहिए। इसके मुताबिक २०५० तक भारत दुनिया की तीन आॢथक महाशक्तियों (अमेरिका व चीन के साथ) में से एक होगा। प्राइस वाटर हाउस कूपर्स ने हाल में ही ‘द वर्ल्ड इन 2050’ नामक रिपोर्ट प्रकाशित की है। जिसके अनुसार २००५ से २०५० के बीच भारत की आॢथक विकास दर सबसे अधिक होगी। यदि कोई यह सोचे कि वर्ष २०१३ तक आॢथक विकास दर के मामले में भारत चीन से आगे निकल जायेगा-ऐसा सोचने का आधार क्या है?

इसके जवाब में जॉन हॉक्सबर्थ का कहना है कि २०५० तक भारत में युवाओं की तादाद सबसे ज्यादा होगी। मशहूर आॢथक पत्रिका ‘द इकोनॉमिस्ट’ के दक्षिण एशिया के ब्यूरो प्रमुख साइमन लाँग भी जॉन हॉक्सबर्थ से सहमति व्यक्त करते हैं। इनका कहना है कि युवाओं की बढ़ती तादाद और उनकी निरन्तर बढ़ती जा रही व्यावसायिक सक्रियता की वजह से आगामी कुछ वर्षों के भीतर आॢथक विकास दर के मामले में भारत चीन को भी काफी पीछे पछाड़ देगा, पर आखिर यह होगा कैसे? इस बारे में सभी की अपनी शंकाएँ हो सकती हैं, जिसमें काफी कुछ सच भी होगा।

आंक्टाड द्वारा प्रकाशित ‘वर्ल्ड इकोनामिक रिपोर्ट २००५’ में इन आशंकाओं को दूर किया गया है। इसके मुताबिक एफडीआई के मामले में भारत दुनिया का दूसरा सर्वाधिक पसंदीदा देश है। पहले नम्बर पर संयुक्त रूप में अमेरिका व चीन हैं। अनुसंधान एवं विकास सम्बन्धी कम्पनियाँ लगाने के मामले में तो भारत दुनिया का सबसे पसंदीदा स्थान है। लन्दन स्थित कैस विजनेस स्कूल के प्रोफेसर सुशान्त रोथ के मुताबिक यदि भारत अपने बुनियादी ढाँचे को दुरुस्त कर ले, तो तकनीकी एवं व्यावसायिक ज्ञान से भरपूर युवावर्ग और उद्यमी निवेशकों की बदौलत भारतीय अर्थव्यवस्था को चीन से आगे निकलने में वक्त नहीं लगेगा। रोथ के मुताबिक जहाँ तक विकास के लिए सामाजिक स्वीकृति का सवाल है, भारत का लोकतंत्र इसके लिए ज्यादा अनुकूल है। चीन की शासन प्रणाली में निर्णय भले ही त्वरित रूप से लिया जाता हो, भारत की तरह निर्णय को सामाजिक स्वीकृति नहीं मिलती है।

भारतीय आॢथक ङ्क्षथकटैंक-नेशनल काउंसिल ऑफ एप्लायड इकोनामिक रिसर्च के सीनियर फेलो राजेश शुक्ला का कहना है कि भारत में विकास दर का मतलब है-सामाजिक विकास, जबकि चीन में विकास का किसी सामाजिक आयाम से कोई वास्ता नहीं है। भारत में अपने युवाशक्ति के बलबूते व्यावसायिक एवं आॢथक महाशक्ति बनने की भरपूर क्षमता है। यहाँ समाज के सभी वर्गों के युवा अपने प्रतिभा व श्रम के बल पर तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। उनकी व्यावसायिक समझ में आश्चर्यकारी क्षमता है। देश के पास यह ऐसा अतुलनीय संसाधन है जिसका कहीं कोई तोड़ नहीं है। यही तो वजह है कि दुनिया के बड़े से बड़े व्यावसायिक प्रतिष्ठान भारत के युवाओं को तरजीह दे रहे हैं। भारत के युवा भी इस पथ पर तेजी से प्रगति कर रहे हैं। उनकी सोच बहुआयामी है। इसी के चलते अनेकों युवाओं ने ग्रामीण भारत को भी सँवारने की ठानी है।