खोजें जीवन लक्ष्य, क्योंकि इसके बिना युवावस्था सही राह न खोज पायेगी। यौवन की शक्तियाँ यूँ ही बिखरती-बर्बाद होती रहेंगी। लक्ष्य की खोज न हो पाने पर हर राह भटकाती है। ओछे आकर्षण और उनींदें सपनों की कोई उमर नहीं होती। जिन्दगी में यदि सार्थकता खोजनी है, युवावस्था की शक्तियों का सही-सार्थक नियोजन करना है तो जीवन लक्ष्य के सही निर्धारण में तत्परता बरतनी चाहिए। जो युवावस्था से गुजर रहे हैं, उनमें से हर एक अनुभव यही कहता है कि वे बहुत कुछ करने में सक्षम हैं। उनके मन के खजाने में इन्द्रधनुषी ख्वाबों की कमी नहीं है। लेकिन इनमें कौन सा ख्वाब है? अपने जोश और दमखम का उपयोग कैसे करें? इसके लिए उन्हें अपने लक्ष्य का पता चाहिए।

इसे कौन बतायेगा? इस सवाल के उत्तर में गीतानायक श्रीकृष्ण कहते हैं-‘उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शन:’(४/२३) इस ज्ञान का उपदेश तत्त्वदर्शी महापुरुष करेंगे। स्मृति के बोझ से लदे या कलम की कालिख से रँगे हुए लोगों के लिए शायद यह कर पाना सम्भव नहीं। जिन्होंने जिन्दगी की बारीकियों, सूक्ष्मताओं एवं गूढ़ताओं को सही समझा हो वही यह काम कर सकते हैं, क्योंकि जीवन लक्ष्य के निर्धारण में सबसे जरूरी एवं अहम बात है-स्वयं की मौलिक विशेषताओं एवं सम्भावनाओं का ज्ञान। अपनी अभिरुचि एवं प्रकृति का सही परिचय। अपने अंतस् की सम्पदा एवं आसपास की परिस्थितियों का सही बोध। दृष्टि गहरी हो और अंतस् के अँधेरे-उजाले दिखाई दें तो यह काम स्वयं भी किया जा सकता है। पर प्रायः ऐसा हो नहीं पाता, क्योंकि युवावस्था में स्थिरता, एकाग्रता एवं धीरज दुर्लभ ही नजर आता है।

लोकमान्य तिलक के जीवन प्रसंगों को जिन्होंने पढ़ा है, उन्हें पता है कि अपनी युवावस्था में तिलक की तेजस्विता अपूर्व थी। वह महाबली एवं परम पराक्रमी थे। किन्तु अपनी क्षमताओं के अनुरूप वह सही और व्यापक लक्ष्य नहीं चयन कर पा रहे थे। असमंजस के इन्हीं पलों में उन्हें स्वामी विवेकानन्द की याद आयी, जिनसे वह पहले एक रेलयात्रा के समय मिल चुके थे। अगले कुछ समय बाद जब कांग्रेस के कलकत्ता  अधिवेशन के समय उनका कलकत्ता आना हुआ, तब उन्होंने स्वामी विवेकानन्द से बेलूर मठ में मुलाकात की। स्वामी जी ने अपनी अंतर्दृष्टि से उनके अंतस् की सामर्थ्य को परखा और उन्हें उनके अनुरूप जीवन लक्ष्य सुझाया। तिलक ने भी स्वामी जी के आदेश को शिरोधार्य करते हुए अपनी युवावस्था को इस महत् लक्ष्य के लिए अर्पित कर दिया। लक्ष्य की ओर बढ़ते उनके कदमों ने उन्हें बाल गंगाधर से लोकमान्य बना दिया।

अपने वर्तमान राष्ट्रपति ए.पी.जे. अब्दुल कलाम की जीवन कथा- ‘अग्नि की उड़ान’ जिन्होंने पढ़ी है, उन्हें उनके द्वारा दी गयी देहरादून की परीक्षा में असफलता का प्रसंग याद होगा। इस असफलता से उनका मन खिन्न था और वे अपने जीवन लक्ष्य को खोज नहीं पा रहे थे। तभी उन्होंने ऋषिकेश आकर दिव्य जीवन संघ के स्वामी शिवानन्द से मुलाकात की। इस मुलाकात ने उन्हें न केवल जिन्दगी के आध्यात्मिक रहस्यों की ओर उन्मुख किया, बल्कि सही जीवन लक्ष्य खोजने में भी मदद की।जब तक जीवन में ऐसे अवसर न सुलभ हों, तब तक युवकों को चाहिए कि वे एक डायरी लें और उसके एक पन्ने पर उन बातों को लिखें, जिन्हें वे पाना चाहते हैं, जो उनकी दिली ख्वाहिशें हैं। यह लेखन वरीयता क्रम से हो। दूसरे पृष्ठ में क्रमवार वह सब लिखें; जिसे कर पाने की क्षमता उनमें है। इसे भी वरीयता क्रम में लिखें। इनका परस्पर मिलान करके वे स्वयं की प्रकृति को परखें और अपनी सबसे अंतरंग चाहत को लक्ष्य बनाएँ और अपनी सामर्थ्य को तदनुरूप नियोजित करें। हालाँकि इस प्रक्रिया में कई संदेह उभरने की उम्मीद है। ऐसे में जीवन लक्ष्य की खोज में इस सूत्र को अपना मार्गदर्शक मानें कि जीवन लक्ष्य को सम्पूर्ण, अंतस् की गहराइयों को संतुष्टि देने वाला और दूरगामी सत्परिणाम प्रस्तुत करने वाला होना चाहिए। यह कुछ ऐसा हो जिसे पूरा करने में आंतरिक प्रकृति परिशोधित होती चले और बाहरी परिस्थिति से जूझने की क्षमता निरन्तर बढ़ती जाय। ऐसा हो सके, तो युवाओं में अपने आप ही  संकल्प शक्ति जाग्रत् होने लगती है।